60 गुरु केसे कहते है

धर्म उपदेशक और गुरु दोनो अलग है। (1) पुरोहित पंडित जी (2 )कथावाचक अथवा शास्त्री गण (3 )तपस्वी त्यागी सन्यासी (4 )वेदांती गण (5 )योगी अथवा आध्यात्मिकता गण,गुरु (6 )अंशावतारी गुरु (7 )पूर्ण अवतारी तत्वज्ञान दाता सद्गुरु (1 )धार्मिक मान्यताओं के अंतर्गत प्रायः खासकर देहातोंप्रारंभिक घरेलू पूजा-पाठ कथा सत्यनारायण व्रत कथा आदि सांसारिक उपनयन संस्कार विवाह संस्कार आदि उत्सव बगैरा को पुरोहित पंडित जन संपन्न कराते है प्रारंभिक स्तर पर इनको महत्व भी अधिक दिया जाता है क्योंकि प्रायः सभी घरेलू धार्मिक अनुष्ठान इन्हीं के माध्यम से हुआ करता है इसके एवज में दान दक्षिणा आदि प्राप्त करके अपना परिवार जीवन यापन करते कराते हैं जोकि वशिष्ट जी महाराज के अनुसार समाज में निंदनीय और घृणित कार्य है ऐसा इसलिए उन्होंने कहा क्योंकि यजमानों का सारा प्राश्चित इन्हीं पुरोहित लोगों पर पड़ता है प्रायः ऐसा देखा जाता है कि पुरोहित की आमदनी चाहे जितनी भी हो प्रायः कंगाली का ही जीवन व्यतीत करते हैं धर्म की वास्तविक स्थिति से इनका कोई मतलब नहीं होता । इन्हें गुरु की संज्ञा नहीं दी जा सकती (2 )कथा वाचक एवं शास्त्री गण कर्मकांडी मान्यता के अंतर्गत किसी शास्त्र विशेष पर जैसे भागवत महापुराण रामायण रामचरितमानस गीता आदि आदि ग्रंथों पर थोड़ा-बहुत अध्ययन करके खासकर श्री राम और कृष्ण जी की लीला हमारे नेनो को जो हंसाने वाला हो रुलाने वाला जन मानस को रिझाने वाला होता तथा ऐसी लीला प्रकरण को जिसमें जनमानस रुचि लेते हो और अधिकार अधिक दान दक्षिणा देते हो उसे खूब इधर-उधर के प्रकारों को लेकर जोड़ घटा कर वर्णन करते हैं इनका एक ही लक्ष्य रहता है धन अर्जन करने का ऐसी कथा वाचक भी गुरु की श्रेणी में नहीं आते (3) तपस्वी त्यागी सन्यासी (क ), तपस्वी तप शब्द का शाब्दिक अर्थ है तपना यानी कष्ट सहन करना सत्य के लिए अथवा परमात्मा परमेश्वर के लिए अथवा धर्म की राह पर रहने चलने पर जो भी कष्ट परेशानियां आती हैं उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अथवा सहज भाव में सहन करते हुए प्रसन्न मुद्रा में धर्म पथ पर चलते रहना तप कहलाता है जबकि यही सब स्थिति संसारिक परिवारिक स्थिति परिस्थिति में होती हैं तो उसे आपदा विपदा कहते हैं क्योंकि यह शरीर और परिवार को कष्ट कर अति कष्टकर बना देता है कंगाल बना देती है बता ग्रस्त बना देती है जिससे आदमी टूट जाता है और प्रायः अधिकतर व्यक्ति नाना प्रकार के व्यक्तियों का शिकार हो जाया करते हैं जबकि ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों तपस्वी को आगे बढ़ने हेतु धर्ता प्रदान करती है साहस प्रदान करती है अपने तप के मार्ग में सत्य के मार्ग में भगवत मार्ग में धर्म के मार्ग में बल प्रदान करती है (ख )त्यागी तप त्याग और सन्यास लगभग एक ही श्रेणी के अंतर्गत होने रहने वाले भिन्न भिन्न प्रकार हैं तब सत्य के लिए परमेश्वर के लिए धर्म के लिए दुख कष्ट आपदा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रसन्नतापूर्वक सहज सहनशीलता है तो त्याग सत्य की राह में परमेश्वर की राह में धर्म की राह में नकारात्मक झूठी और मायावी चीजों से रहित होना रहना है (ग ) सन्यासी गण सन्यास धर्म अथवा परमात्मा परमेश्वर भगवान के खोज के अंतर्गत प्रारंभिक क्रिया-कलाप के साथ ही साथ एक बहुत ही कठिन संकल्प और संकल्प का पालन भी है वास्तव में सन्यास का अर्थ परमेश्वर की खोज में परिवारिक सांसारिक संबंधों सहित सुख-दुख से अपनी इंद्रियों को बिल्कुल निरस्त कर देना अर्थात पूर्णता भोग विषयों से अपने इंद्रियों को मोह तोड़ कर पूर्णता परमेश्वर की खोज में लगा देना तपस्वी त्यागी सन्यासी भी गुरु की श्रेणी में नहीं आते (4) वेदांती गण वेदांत का शाब्दिक अर्थ वेद के अंतर्गत स्थित अंतिम उपलब्धि है जो वेद के अंतर्गत स्थित अंतिम उपलब्धि का अर्थ भाव है परमतत्व रूप आत्मतत्व शब्द रूप भगवत तुम परमात्मा परमेश्वर परम ब्रह्म की प्राप्ति जिसमें जड़ चेतन रूप संपूर्ण सृष्टि ब्रम्हांड भी अपने संपूर्ण प्रधानों सहित संपूर्णता साहब समाहित रहता है जिसे जान प्राप्त कर लेने के पश्चात कुछ भी जानना प्राप्त करना शेष नहीं रहता। इन्हें भी गुरु की संज्ञा नहीं दी जा सकती (5 )योगी अथवा अध्यात्मवेत्ता गुरु योग का समान अर्थ होता है जोड़ना योग शारीरिक एक्सरसाइज कसरत को नहीं कहते योग का मतलब है जीव आत्मा ईश्वर ब्रह्म से मिलने की क्रिया को यह कहा जाता है इसी योग को अध्यात्म भी कहते हैं क्योंकि अध्यात्म शब्द में आत्मा दो शब्द होता है और उसमें अधि उपसर्ग होता है जिसका अर्थ होता है आत्मा की ओर अर्थात जीव का आत्मा से मिलन जुलन की क्रिया योग है कहने का मतलब सीधा जो जीव आत्मा ईश्वर ब्रह्म से मिला दे या खुद मिल चुका हो उसे गुरु कह सकते हैं। मगर पूर्ण गुरु नहीं कह सकते (6 ) अंशावतारी गुरु अवतारी परम प्रभु परमेश्वर के प्रकाश दूध अथवा प्रकाश संदेश वाहक के रूप में भूमंडल पर आते हैं वह अंशावतारी गुरु कहलाते हैं (7 )पूर्ण अवतारी तत्वज्ञान दाता सद्गुरु पूर्ण अवतारी शब्द का वास्तविक शाब्दिक अर्थ पूर्ण रूप में रहने वाले खुदा गॉड भगवान का अपने परम धाम अमरलोक पैराडाइज से भूमंडल पर अवतरित हाजिर नाजिर कर किसी शरीर विशेष को अनुग्रहित कर उस शरीर के माध्यम से अपने लक्ष्य कार्यरत धर्म धर्मात्मा धरती की रक्षा कार्य संपादन करने वाले से है तत्वज्ञान संपूर्ण का संपूर्णता बातचीत और साक्षात दर्शन सहित सुनिश्चित और स्पष्ट अध्यक्ष बोध सहित यथार्थ जानकारी है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में ही एक व एक मात्र केवल खुदा गॉड भगवान ही दे सकता है खुद को जाना मिला दिखा सकता है वही परमात्मा की सिर्फ केवल सद्गुरु है जो स्वयं अपने आपको दिखा सकता है परमपिता परमेश्वर परमात्मा के अलावा किसी को भी सद्गुरु लिखने का अधिकार परमात्मा ने नहीं दिया अब आप स्वयं ही जांच लें कि जिसे हम लोग गुरु कहते हैं क्या वह गुरु की संज्ञा में आते हैं कि नहीं शिक्षा एवं ज्ञान दोनों अलग अलग शिक्षक और गुरु यह भी दोनों अलग अलग है संतोष सिंह राजपाल

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