412 तपस्वी ,गुरु ,को भगवान का दर्जा देने से हो रहा ''भगवान" का अपमान भगवान किसे कहते हैं


तपस्वी ,गुरु ,को भगवान का दर्जा देने से हो रहा ''भगवान" का अपमान

भगवान किसे कहते हैं

किसी भी साधु, संत, महात्मा, तपस्वी ,को भगवान का दर्जा देना उचित नही है

कोई भी कथा वाचक, धर्म गुरु, या सांसारिक गुरु को "भगवान" का दर्जा शास्त्रों के अनुसार नहीं दिया जा सकता

आज हमारे देश में भगवानों की बाढ़ आई हुई है । जहां देखो वहां लोग भगवान बनने की होड़ है। लेकिन इस समझदार समाज और पढ़े-लिखे युवाओं को समझना पड़ेगा कि हमारे धार्मिक ग्रंथ आखिरकार क्या कहते हैं

भगवान सिर्फ एक होता है जिसे हम परमपिता परमेश्वर भी कहते हैं शास्त्रों के मुताबिक

शास्त्रों के अनुसार ऐसे समझे

"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।।"

यह श्लोक *श्वेताश्वतर उपनिषद* में पाया जाता है और इसका अर्थ है कि एक ही भगवान है जो सभी जीवों में छिपा हुआ है, जो सर्वव्यापी है, और जो निर्गुण है। हम सिर्फ और सिर्फ उसे ही भगवान का सकते हैं

शास्त्रों में कई तपस्वियों का उल्लेख है, जिन्होंने कठोर तपस्या की और अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। कुछ प्रमुख तपस्वी इस प्रकार हैं 
ब्रह्मा: ब्रह्माजी ने एक हजार दिव्य वर्षों तक एकाग्रचित्त होकर अपने प्राण, मन, कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को वश में कर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें चतुः श्लोकी भागवत का वरदान दिया। इतनी तपस्या करने के बाद भी ब्रह्मा जी सिर्फ देवता हैं भगवान नहीं
पार्वती: पार्वती ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तीन हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिए।
ऋषि वशिष्ठ वशिष्ठ ने कठोर तपस्या की और ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने योग वशिष्ठ नामक ग्रंथ की रचना की, जो अद्वैत वेदांत का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
ऋषि विश्वामित् विश्वामित्र ने अपनी गहन तपस्या के माध्यम से अनेक दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कीं। उनकी तपस्या ने उन्हें महर्षि का दर्जा दिलाया।
ऋषि अत्रि अत्रि ने कठोर तपस्या की और देवताओं का सम्मान और आशीर्वाद प्राप्त किया। उनके पुत्र दत्तात्रेय एक महान योगी माने जाते हैं।
ऋषि जमदग्नि जमदग्नि ने वैदिक ज्ञान और तपस्या में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अपने ज्ञान को अपने पुत्रों और अन्य शिष्यों को सिखाया।
-भागीरथ भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा ने उन्हें दर्शन दिए और पृथ्वी पर अवतरित हुईं।
 दुर्वासा ऋषि अपनी क्रोधशीलता और कठोर तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी तपस्या ने उन्हें देवताओं के समान शक्ति प्रदान की।

इन तपस्वियों ने अपनी कठोर तपस्या के माध्यम से अपने लक्ष्य को प्राप्त किया और अपने ज्ञान और शक्ति से समाज का मार्गदर्शन किया।

अगर तपस्या से ही भगवान बना जा सकता होता तो राक्षसों ने भी कोई कम तपस्या नहीं की तो इन राक्षसों को भी भगवान का दर्जा दिया जा सकता है क्या

रावण: रावण ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और 10,000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसने अपनी तपस्या के दौरान अपने सिर को काटकर अग्नि में होम कर दिया, जिससे भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया।
हिरण्यकश्यप: हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और 64,000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसने अपनी तपस्या के दौरान अपने आप को कई कष्ट दिए, जैसे कि एक पैर पर खड़े रहना और केवल हवा पीकर जीवित रहना।
महिषासुर: महिषासुर ने  ब्रह्मा जी की तपस्या की और कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसने अपनी तपस्या के दौरान अपने आप को कई कष्ट दिए, जैसे कि एक पैर पर खड़े रहना और केवल पत्ते खाकर जीवित रहना।
भस्मासुर: भस्मासुर ने  शिव जी की तपस्या की और कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसने अपनी तपस्या के दौरान अपने आप को कई कष्ट दिए, जैसे कि एक पैर पर खड़े रहना और केवल हवा पीकर जीवित रहना।
- *तारकासुर*: तारकासुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसने अपनी तपस्या के दौरान अपने आप को कई कष्ट दिए, जैसे कि एक पैर पर खड़े रहना और केवल पत्ते खाकर जीवित रहना।
भगवान कौन है भगवत गीता के माध्यम से जाने

भगवद गीता में भगवान के बारे में कई श्लोक हैं जो उनकी प्रकृति और गुणों का वर्णन करते हैं।

 भगवान का वर्णन
भगवद गीता के *अध्याय 13* में भगवान के बारे में एक विस्तृत वर्णन है। इस अध्याय में भगवान के गुणों और प्रकृति के बारे में बताया गया है।

श्लोक
एक प्रसिद्ध श्लोक जो भगवान के बारे में बताता है:

"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।"

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 8.21 में है। इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि वह अव्यक्त और अक्षर हैं, और जो मुझे प्राप्त करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।

अन्य श्लोक
एक अन्य प्रसिद्ध श्लोक जो भगवान के बारे में बताता है:

"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।"

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 15.15 में है। इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि मैं सभी जीवों के हृदय में निवास करता हूँ, और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (विस्मृति) होता है।

भगवान के गुण
भगवद गीता में भगवान के कई गुणों का वर्णन किया गया है, जैसे कि:

- *सर्वव्यापी*: भगवान सर्वव्यापी हैं और हर जगह मौजूद हैं।
- *सर्वशक्तिमान*: भगवान सर्वशक्तिमान हैं और सभी शक्तियों का स्रोत हैं।
- *सर्वज्ञ*: भगवान सर्वज्ञ हैं और सभी ज्ञान का स्रोत हैं।

निष्कर्ष
भगवद गीता में भगवान के बारे में कई श्लोक हैं जो उनकी प्रकृति और गुणों का वर्णन करते हैं। अध्याय 8.21 और 15.15 में भगवान के बारे में विशिष्ट श्लोक हैं जो उनकी अव्यक्त और सर्वव्यापी प्रकृति को दर्शाते हैं।

ऐसे ही किसी भी तपस्वी को भगवान का दर्जा देना यानि भगवान का अपमान करना है और शास्त्रों का भी अपमान करना है

हम शास्त्रों के मुताबिक सम्मान सबका करते हैं पर भगवान का दर्जा सिर्फ भगवान को ही दे सकते हैं

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