प्रमोशन में आरक्षण पर हाईकोर्ट की निर्णायक सुनवाई, नई याचिका वापस, अब फैसला करीब
मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण नियम 2025 को लेकर जारी कानूनी विवाद पर आज जबलपुर हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस बने सराफ की डिविजनल बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान आरक्षित वर्ग की ओर से दायर की गई एक नई याचिका पर सबसे पहले बहस हुई, जिसका राज्य सरकार ने कड़ा विरोध किया। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद यह याचिका वापस ले ली गई, जिससे मामले के और लंबा खिंचने की आशंका फिलहाल टल गई है।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि मध्य प्रदेश में 54 विभाग और करीब 1500 कैडर हैं, जबकि पदोन्नति प्रक्रिया बीते कई महीनों से पूरी तरह ठप है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केवल 40 प्रतिशत अधिकारियों की उपलब्धता पर काम कर रही है, जिसका सीधा असर प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। इसी दौरान महाधिवक्ता ने DPC न करने की अंडरटेकिंग वापस लेने का अनुरोध किया, जिस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में स्थगन आदेश भी पारित किया जा सकता है।
इसके बाद मुख्य याचिकाओं पर अंतिम बहस हुई, जिसमें प्रमोशन में आरक्षण के तहत प्रतिनिधित्व की गणना को लेकर तीखा टकराव देखने को मिला। आरक्षित और अनारक्षित—दोनों ही पक्ष इस बात पर सहमत दिखे कि मेरिट के आधार पर चयनित अधिकारियों की स्थिति को अलग से देखा जाना चाहिए, लेकिन यह तय करने पर मतभेद रहा कि जिन्होंने कभी आरक्षण का लाभ लिया है, उन्हें कैसे गिना जाए। सभी पक्षों की बहस के बाद हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 3 फरवरी दोपहर 12:30 बजे का समय तय किया है, जिसके बाद इस बहुप्रतीक्षित मामले में फैसला आने की उम्मीद है।
बाइट अमूल श्रीवास्तव अधिवक्ता
जबलपुर से वाजिद खान की रिपोर्ट